Tuesday, 13 October 2020

चित्रकाव्य


 द्रोण रचना 

संथपणे निघाली 

सागरी मिलना,  

देती निरोप 

निळे घन 

प्रतिमा 

त्यांची 

हो.... 

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शांत, स्तब्ध जलाशय 

सभोवती हिरवाई रमणीय 

नितळ जळात प्रतिबिंबित 

पाहुनी मन होय मोहित 

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निसर्गाचा सुख सोहळा 

चित्री प्रतिबिंबित झाला 

हिरवा डोंगर जळात रेखला 

देखोनी आनंद मन्मनाला !


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ओढ सागराची 

वाहे सरिता वेगात 

आठवण मनी माहेरची 

तसेच रंगवले का ह्या चित्रात?  

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चित्रचारोळी 

झाडाझुडुपातुन वाट काढत

 वाहे संथपणे नदी 

की नदीकाठी वाढे  झाडी? 

संभ्रम पडतसे  मनात !



अर्चना कुलकर्णी. 

13/10/20



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