प्राक्तन प्राजक्ताचे
कोणा न कळले
उमलताच ते
मातेने झिडकारले
धरेने सावरले
रमणी ने वेचिले
परी कधी न माळिले
हरी चरणी अर्पिले
असुनी सुवास हि
कोणी त्यास न पुसिले
त्याचे दुख्ख फक्त
त्यानेच साहिले ...!
अर्चना
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पारिजातक मला नेहमीच भावतो
जो स्वतः करिता फुलतो
आसमंताला सुगंधित करतो
अन मनी फक्त हरीचरणाची आस धरतो !
अर्चना ....

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